सी सेक्शन/ऑपरेशन: एक ज़रूरी मेडिकल प्रक्रिया या पैसा कमाने का जरिया?

भारत में सी-सेक्शन या सिजेरियन सेक्शन का खर्चा अलग-अलग आता है। इसमें हॉस्पिटल रुकना, एनेस्थीसिया और डॉक्टर की फीस मिलाकर कुल खर्चा सरकारी हॉस्पिटल में 5000 से लेकर 40,000 तक आ सकता है। हालांकि अभी तक इसमें कोई देशव्यापी सर्वे नहीं हुआ जिसमें पता चले की इसका औसत खर्चा है कितना।

महिला एवं बाल विकास मन्त्रालय की मंत्री मेनका गांधी ने स्वास्थ मंत्री जेपी नड्डा को लिखा की सभी हॉस्पिटल इस बात का खुलासा करें की वो साल में कितने बच्चे ऑपरेशन से पैदा करते हैं और कितने नॉर्मल डिलिवरी से।

सी-सेक्शन बनाम नॉर्मल डिलिवरी

कई प्रकार के कारक इस बात में भूमिका निभाते हैं की डिलिवरी कैसी होगी। सी-सेक्शन को एमर्जन्सि के समय किया जा सकता है। कभी कभी पहले से ही ऑपरेशन करवाने की बात चलती है, ये बात तब चलती है जब माँ की उम्र ज़्यादा होती है, बच्चा सही मुद्रा में नहीं होता है या माँ को मोटापे की समस्या होती है। अगर आपातकाल में ऑपरेशन किया गया तो रिस्क काफी बढ़ जाता है। ये निर्णय काफी मेडिकल कारणों की वजह से लिया जा सकता है जैसे भ्रूण में तनाव या एम्निओटिक द्रव का खत्म हो जाना।

योनी से बच्चे को जन्म देना काफी दर्दनाक होता है। हालांकि इसमें केवल एक बार दर्द होता है। दूसरी तरफ ऑपरेशन से बाद में भी काफी गंभीर लक्षण दिख सकते हैं। इनमें से कुछ इन्फ़ैकशन, अंग में चोट, खून का ज़्यादा बहना, ज़्यादा समय तक हॉस्पिटल में रहना, रिकवरी टाइम, अन्य सर्जरी की संभावना है।

सबसे बड़ी बात है की इस प्रक्रिया में भले ही काफी समस्या आई हो पर फिर भी पिछले कुछ दशकों में इसमें काफी बढ़ौत्तरी हुई है, इसमें निर्णय नॉन-मेडिकल कारणों से प्रभावित हुए हैं।

विज्ञान या पैसा?

कुछ मांग

ये सभी जानते हैं की सरकारी हॉस्पिटल की तुलना में प्राइवेट हॉस्पिटल में ऑपरेशन काफी होते हैं, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन पर कोई रोक टोक नहीं है और इससे इनके अच्छे पैसे बनते हैं। ऑपरेशन के पीछे सबसे अहम कारण है ये काफी आसान होते हैं, क्योंकि नॉर्मल डिलिवरी में ज़्यादा टाइम भी लगता है। इसके अलावा हर जगह डॉक्टर को काफी सम्मान की नज़र से देखा जाता है और इसलिए कोई भी उनकी इच्छा के विरुद्ध नहीं जाता है। आमतौर पर डॉक्टर महिलाओं के डर का फायदा उठाते हैं और उन्हें ऑपरेशन के लिए प्रेरित करते हैं।

हमेशा इस बात पर बहस चलती है की महिलाओं को इस बात का हक़ होना चाहिए की उन्हें अपने बच्चे को कैसे जन्म देना है। लेकिन डॉक्टर की ये भूमिका भी है की वो ऑपरेशन के फायदे और नुकसान दोनों के बारे में महिलाओं को बताएं। और इस समय कई डॉक्टर अपना काम ईमानदारी से नहीं करते।

मेडिकल कॉलेज के छात्रों को क्लास दी जाती है

ऐसा भी देखा गया है की जिन हॉस्पिटल के अपने मेडिकल कॉलेज होते हैं वहाँ ऑपरेशन कुछ ज़्यादा ही होते हैं। इसके पीछे का कारण सीधा है, हॉस्पिटल छात्रों को दिखाना चाहते हैं की ऑपरेशन कैसे होता है। सबसे बड़ी और चिंता की बात ये है की प्राइवेट मेडिकल कॉलेज से पढ़ने वाले ज़्यादातर डॉक्टर को पता ही नहीं होता की नॉर्मल डिलिवरी कैसे की जाती है। अगर प्रसव में थोड़ी भी देरी हो रही है तो ये सभी डॉक्टर तुरंत ऑपरेशन के लिए जाने के लिए कहेंगे।

सही महूरत वाला बच्चा

भारत में ऑपरेशन कुछ खास विधान की वजह से भी होते हैं। कुछ लोग ज्योतिषी को दिखाकर अपने बच्चे को कुछ खास समय में भी पैदा करने की कोशिश करते हैं, और इस वजह से ऑपरेशन होते हैं।

आगे क्या हो

मेडिकल काउंसिल एक्ट के अनुसार डॉक्टर को एक निश्चित समय में किए गए ऑपरेशन के बारे में जानकारी देनी होगी। हालांकि ये सभी नियम पेपर पर ही रह जाते हैं। इसके साथ सभी हॉस्पिटल को बच्चे और माँ की प्रसव के समय स्थिति का रिकॉर्ड भी रखना चाहिए। इससे डॉक्टर निर्णय ले सकते हैं की डिलिवरी नॉर्मल हो या ऑपरेशन से।

सरकार को वैसे नॉर्मल डिलिवरी और ऑपरेशन के खर्चे भी फिक्स कर देने चाहिए। इससे डॉक्टर को कुछ भी करने की छूट नहीं मिलेगी। इस बात पर भी ज़ोर देना चाहिए की प्रेगनेंट महिलाओं को कैसे इस विषय पर जानकारी दी जाए, और बताया जाए की ऑपरेशन से क्या नुकसान होते हैं।